संकुचित सोच से मुक्ति में ही निहित है महानता का सूत्र


*सीताराम गुप्ता*
     संसार में किसी भी क्षेत्र में सर्वोच्च शिखर पर पहुंचना सरल नहीं होता। बात चाहे साहित्य-संस्कृति अथवा कला की हो, व्यवसाय अथवा समाज सेवा की हो या अन्य किसी भी क्षेत्र की किसी भी क्षेत्र में महानता प्राप्त करने वाले लोग कुछ दुर्लभ गुणों से ओतप्रोत होते हैं जो सामान्य लोगों में दुर्लभ होते हैं। कुछ व्यक्ति इसी लिए महानता की श्रेणी में आ जाते हैं क्योंकि वे वे सभी कार्य करते हैं जिन्हें सामान्य व्यक्ति नहीं करते अथवा महत्त्व नहीं देते। और वे कुछ ऐसे कार्य करते ही नहीं जिनके करने में सामान्य व्यक्ति अपना अधिकांश समय नष्ट कर देते हैं। कुछ व्यक्ति उन्हें जो भी करना होता है उसे फौरन कर डालते हैं और जो नहीं करना होता उसे न तो करते हैं और न उसके न करने पर परेशान रहते हैं। ये कर लेता तो शायद अच्छा रहता या ये नहीं करता तो बहुत ठीक रहता इस प्रकार की उधेड़बुन और द्वंद्व से दूर रहने वाले व्यक्ति अपने जीवन में सचमुच बहुत आगे पहुंच जाते हैं। एक आम आदमी अपना सारा समय निरर्थक बातों के चिंतन व बेकार की उधेड़बुन में नष्ट कर डालता है। 


     कुछ लोग किसी भी कार्य को करने से पहले फौरी लाभ-हानि का आकलन नहीं करते। वे कार्य की समाज के लिए उपयोगिता के तत्त्व पर ज़्यादा ध्यान देते हैं और किसी भी कीमत पर ऐसा कोई कार्य नहीं करते जिससे समाज अथवा राष्ट्र कमज़ोर हो। स्वाभाविक है कि ऐसा महान लोग ही कर सकते हैं। इसके विपरीत एक सामान्य व्यक्ति किसी भी कार्य को करने से पूर्व व्यक्तिगत लाभ-हानि का आकलन करने के पश्चात ही कोई कार्य प्रारंभ करता है। ऐसी संकुचित सोच रखने वाले व्यक्ति कभी महान नहीं हो सकते। बड़ी सोच का परिणामस्वरूप ही किसी को महानता की प्राप्ति होती है। मुझे उर्दू के प्रसिद्ध शाइर बेकल उत्साही साहब का एक शेर याद आ रहा है: ऐ हवाओं के झकोरो कहां आग ले के निकले, मेरा गांव बच सके तो मेरी झोंपड़ी जला दो। ऐसा जज़्बा जो सबके कल्याण के लिए अपना सर्वस्व लुटाने से भी परहेज न करे ही किसी को महान बना सकता है। जो सिर्फ अपना घर बचाने के लिए पूरी दुनिया को दांव पर लगा दें वो महान नहीं निकृष्टतम होते हैं। 


     महान व्यक्तियों के स्वभाव में जड़ता नहीं होती। वे सभी परिस्थितियों व व्यक्तियों को खुले दिल से स्वीकार करते हैं। वे अपने प्रतिद्वंद्वियों व विरोधियों का भी सम्मान करते हैं तथा उनकी अच्छी बातों की दिल खोल कर प्रशंसा भी करते हैं। उनकी अच्छी बातों को स्वयं अपनाने में भी उन्हें संकोच नहीं होता। जब हम किसी अच्छी बात को ये समझकर महत्त्व नहीं देते कि ये तो हमारे विरोधी अथवा प्रतिद्वंद्वी की है तो हम वास्तव में अच्छाई का अपमान करते हैं। हम जिस चीज़ का अपमान करेंगे वो हमारे पास क्यों आएगी? वो हमारे पास आने की बजाय हमसे दूर होती चली जाएगी। अच्छाई जहां भी हो उसका मन से स्वागत होना चाहिए। दूसरों की समृद्धि से ईर्ष्या करने वालों के साथ भी तो यही होता है। समृद्धि किसी की भी क्यों न हो उससे ईर्ष्या करने से स्वयं की समृद्धि का लोप हो जाना भी निश्चित है। जिससे हम ईर्ष्या करेंगे वो हमारे पास क्यों आएगा या आएगी? बड़ा अथवा महान होना है तो सद्गुणों और समृद्धि की प्रशंसा करना सीखना होगा अब ये चीज़ें चाहे जहां भी क्यों न हों। सामान्य लोग ये हरगिज नहीं कर सकते और सामान्य बने रहने को विवश होते हैं। सामान्य लोगों को दूसरों की टांग खींचने में आनंद आता है। इस आनंद की प्राप्ति के लिए वे अपनी सारी ऊर्जा नष्ट कर डालते हैं। अच्छे कार्यों के लिए उनके पास ऊर्जा बचती ही नहीं। अपनी ऊर्जा का सही व सकारात्मक प्रयोग करने का गुण ही लोगों को महानता की ओर ले जाता है। 


*सीताराम गुप्ता,,ए.डी. 106-सी, पीतमपुरा,,दिल्ली-110034,मोबा0 नं0 09555622323,Email : srgupta54@yahoo.co.in