नमिऊण तीर्थ पर वर्षीतप पारणा महोत्सव का आगाज 24 अप्रैल से

सिवनी(मध्यप्रदेश)। महाकौशल की पुण्यधरा पर उदीयमान श्री नमिऊण पाश्र्वनाथ मणिधारी जैन श्वेताम्बर तीर्थ में सर्वप्रथम बार सामुहिक वर्षीतप पारणा त्रिदिवसीय महोत्सव का भव्य आयोजन किया जा रहा है। जिसका आगाज 24 अप्रैल से होगा। श्री नमिऊण पाश्र्वनाथ मणिधारी जैन श्वेताम्बर तीर्थ के अभय सेठिया ने बताया कि खरतरगच्छ आचार्य जिन पीयूषसागर सूरीश्वरजी म.सा. पावन प्रभावक निश्रा व मनोहर मंडल प्रमुखा मनोरंजनाश्रीजी म.सा., साध्वीरत्ना विजयप्रभाश्रीजी म.सा., तपोरत्ना जिनशिशु साध्वी श्री प्रज्ञाश्रीजी म.सा. आदि साधु-साध्वी भगवतों के सानिध्य में पूज्य तपस्वी मुनिप्रवर संवेगरत्न सागरजी, साध्वी रत्ना प.पू. प्रगुणाश्रीजी म.सा., साध्वी रत्ना प.पू. प्रार्थनाश्रीजी म.सा., साध्वी रत्ना प.पू. सत्कारनिधिश्रीजी म.सा. गुरू भगवंतों सहित देश के अलग-अलग प्रांतों के तपस्वियों को इक्षुरस से 400 दिन की कठिन वर्षीतप की तपस्या का पारणा अक्षय तृतीया 26 अप्रैल को नमिऊण तीर्थ के नैसर्गिक वातावरण में आयोजित होगा। पारणा महोत्सव के अन्तर्गत त्रिदिवसीय कार्यक्रम का आयोजन 24 अप्रैल से 26 अप्रैल तक होगा। तीर्थ प्रबंधन समिति ने देशभर में वर्षीतप की आराधना करने वाले आराधकों को नमिऊण तीर्थ में साधु-साध्वी भगवंतों के सानिध्य में पारणा करने का निवेदन किया है।
जानिए, क्या होता है वर्षीतप और पारणा



हस्तिनापुर की धरती अपने आप में अनेक इतिहास संजोए है। महाभारतकालीन एवं सिख धर्म के इतिहास की पावन स्थली होने के साथ जैन धर्म के अनुयायियों के लिए यह धरती महान तीर्थ है। बैसाख माह की शुदि तृतीय का जैन धर्म में विशेष महत्व है। हस्तिनापुर का इस तिथि से विशेष संबंध है। अक्षय तृतीया के दिन जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव ने निराहार तपस्या के बाद प्रथम बार यहीं पर आहार ग्रहण किया था और उसी दिन से हस्तिनापुर की पहचान अमिट हो गई।
अवसर्पिणी काल में भगवान ऋषभ देव 400 दिन की निराहार तपस्या के बाद प्रथम पारणा के लिए भ्रमण करने लगे, परंतु उन्हें कहीं भी योग्य आहार नहीं मिला। उस समय मुनि को आहार देने की विधि कुछ लोग ही जानते थे। देश विदेश से विहार करते हुए भगवान ऋषभदेव बैसाख शुक्ल तीज के दिन हस्तिनापुर पहुंचे। यहां राजा सोमप्रभु का शासन था। प्रभु के आगमन की चर्चा पूरे राज्य में फैल गई।
महल के पास पहुंचने पर राजकुमार श्रेयांस ने नतमस्तक होकर उन्हें प्रमाण किया। उन्हें पूर्व जन्म का ज्ञान उत्पन्न हुआ। इस ज्ञान से उन्होंने प्रभु को आहार देने की विधि को जाना और इक्षुरस को ग्रहण करने की प्रार्थना की। प्रभु ने इक्षुरस ग्रहण कर तप का पारणा किया। उसी समय से यह दिन अक्षय तृतीया या आखा तीज नाम से प्रसिद्ध हो गया। जैन धर्म के अनुसार अवसर्पिणी काल में मुनि महाराजों को आहार देने की परंपरा हस्तिनापुर की धरती से प्रारंभ हुई। आदिनाथ भगवान के दीक्षा के साथ ही तपस्या होती चली, जो 400 दिनों तक रही। समापन इक्षुरस (गन्ने का रस) ग्रहण कर किया गया। तब से अब तक परंपरा चली आ रही है। तपस्या में एक वर्ष तक एक दिन निर्जला उपवास, एक दिन एक समय ही भोजन ग्रहण किया जाता है। नियम का पालन करने वाले ही वर्षीतपी कहलाते हैं।