बाल कविता संग्रह - नया सवेरा


* बाल कविता संग्रह - नया सवेरा

* कवि - बलदाऊ राम साहू

* प्रकाशक - जास्मिन प्रकाशन, दिल्ली

* प्रकाशन वर्ष - 2019

* संस्करण - प्रथम

* पृष्ठ - 32

* मूल्य - ₹ 80


हिन्दी बाल साहित्य के क्षेत्र में बलदाऊ राम साहू आज किसी परिचय के मोहताज नहीं है। कवि, लेखक, गीतकार बलदाऊ राम साहू की हिन्दी और छत्तीसगढ़ी भाषा में दर्जनभर से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें आधे से अधिक बाल साहित्य की विभिन्न विधाओं पर आधारित हैं। साहू जी विगत पाँच दशक से निरंतर हिन्दी और छत्तीसगढ़ी भाषा में बाल मनोविज्ञान पर आधारित उत्कृष्ट कोटि के बाल साहित्य का सृजन कर रहे हैं। उन्होंने अपनी लेखनी से बाल साहित्य में नये आयाम जोड़े हैं और उसे समृद्ध भी किया है।

साहू जी की लिखी हुई समीक्षित पुस्तक ‘नया सवेरा’ का प्रकाशन सन् 2019 में जास्मिन प्रकाशन, दिल्ली से हुआ है। पुस्तक की भूमिका लिखी है- प्रख्यात कवि, ललित निबंधकार जयप्रकाश मानस जी ने।

'नया सवेरा' में संग्रहीत कविताएँ विविधमुखी हैं। इसमें जहाँ पशु-पक्षियों, बंदर-मदारी, राजा-रानी, दादी-नानी, परी जैसी बच्चों के पसंदीदा विषयों की कहानियों पर आधारित खूबसूरत कविताएँ सम्मिलित हैं, वहीं वैज्ञानिक दृष्टिकोण और वर्तमान समय के यथार्थ को भी इनमें देखा जा सकता है। 

साहू जी की हर कविता का शीर्षक बहुत ही अर्थपूर्ण है, जिससे बच्चे उससे सहज ही परिचित हो सकेंगे। हर कविता का एक सार्थक सन्देश भी है, जो अंततः बच्चों को मनोरंजक तरीके से शिक्षित करते हुए उन्हें सुसंस्कारी बनाएगी।  

‘'काम करें हम अच्छे-अच्छे’' शीर्षक की कविता में कवि खेल-खेल में ही बच्चों से वे बड़ों का सम्मान करने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण की बात भी कह देते हैं :-

करें बड़ों का हम सब आदर

छोटों पर भी प्यार लुटाएँ

मीठी-मीठी बातें कर के

सबके मन को हम हर्षाएँ

हम कहलाएँ अच्छे-बच्चे

काम करें हम अच्छे-अच्छे।

जीवों को हम नहीं सताएँ

आसपास हम पेड़ लगाएँ

पर्यावरण सुखद बन जाए

ऐसे कुछ हम कदम उठाएँ

कभी ना बनें कच्चे बच्चे

काम करें हम अच्छे-अच्छे।

परी बच्चों को प्रिय होती है, जो अक्सर सपने में आती है। बालकवि बलदाऊ राम साहू 'परियों की रानी'  कविता में लिखते हैं :-

परियाँ सपनों में आती हैं

और कहानी बन जाती हैं

दिन में आगे बढ़ जाने की

हमको राह दिखा जाती हैं।

साहू जी की बहुत सरल भाषा में जनमानस में बहु-प्रचलित मुहावरों से युक्त खूबसूरत पंक्तियाँ देखिए :- 

कभी लाल-पीली करते हैं/आँखें कभी दिखाते हैं/आँखमिचौनी कभी खेलते/आँखें कभी चुराते हैं।

कभी आँख फेरा करते हैं/कभी तरेरा करते हैं

आँखों-आँखों में बतियाते/कभी आँख झपकाते हैं।

बच्चों की दुनिया निराली होती है, और वैसी ही होती है उनकी सोच। एक कुशल बालकवि ही बच्चों की सोच के अनुरूप काव्य सृजन कर सकता है, जैसाकि साहू जी ने बखूबी किया है। कविता ''अगर मैं पापा होता'' की ये खूबसूरत पंक्तियाँ देखिए :-

सुनो अगर मैं पापा होता, हरदम प्यार जताता।

उछल-कूद करते जब बच्चे, कभी न डाँट पिलाता।

रखता मैं खुश उनको हरदम, रोज घुमाने जाता।

ले देता मैं खेल-खिलौने, टॉफी उन्हें दिलाता।

साहू जी कई कविताएँ कथा रूप में हैं, जिनमें में बच्चों को बहुत ही रोचक तरीक़े से अपनी बात बताते हैं। जैसे, ''चींटा-चींटी चले घूमने'' शीर्षक कविता में वे बच्चों को बहुत ही रोचक शैली में कुछ अच्छी बातें सिखाते हैं :-

इसीलिए हम कहते भैया

संयम से तुम खाओ

चटर-पटर यूँ खाकर अपनी

सेहत नहीं गँवाओ।

इसी प्रकार ''बैठ आलसी ही रोता है'' में वे लिखते हैं :-

सबकी किस्मत अलग-अलग है, बल भी अलग अलग होता है।

श्रम से ही जीवन खिलता है, बैठ 'आलसी' ही रोता है।

''आओ मिलकर वृक्ष लगाएँ'' कविता की ये पंक्तियाँ देखिए, जिसमें कवि बलदाऊ राम साहू जी बच्चों से वृक्षारोपण करने और पर्यावरण संरक्षण की बात कितनी सहज भाषा में करते हैं :-

आओ मिलकर वृक्ष लगाएँ

सुंदर पर्यावरण बनाएँ

चारों ओर रहे हरियाली

धरती का सौंदर्य बढ़ाएँ।

जिस प्रकार कवि सोहनलाल द्विवेदी जी गरजते थे ''खड़ा हिमालय बता रहा है न डरो न आँधी पानी से'' ठीक उसी प्रकार साहू जी हुँकार भरते हैं, "उन्नत भाल हिमालय देखो/प्रहरी बनकर खड़ा है। स्वाभिमान की परिभाषा दे/देखो, कैसे अड़ा हुआ है।"

इसी प्रकार "गीत नये गाइए" में वे लिखते हैं :-

मुश्किल हो राह भले,  आँधी-तूफान हो

चुनौतियाँ जो भी हों, आगे बढ़़ जाइए।

पाना है मोती तो, बैठिए न तट पर।

गहरे में पैठकर गोते लगाइए।

बच्चों की मानसिक स्तर के अनुरूप ही ‘'नया सवेरा'’ पुस्तक की भाषा सहज, सरल, सरस और प्रवाहमयी है। इस पुस्तक की डिजाईनिंग एवं साज-सज्जा पर विशेष ध्यान दिया गया है। छोटी-छोटी कविताओं के साथ प्रयुक्त भावानुरूप चित्र जहाँ पुस्तक की सुंदरता में चार चाँद लगा रहे हैं, वहीं ऐसी चित्रमयी पुस्तकें बच्चों को आकर्षित भी करते हैं। पुस्तक में व्याकरणिक एवं वर्तनीगत अशुद्धियाँ भी नगण्य हैं। हमें आशा ही नहीं, वरन् पूर्ण विश्वास है कि यह संग्रहणीय पुस्तक छोटे-छोटे बच्चों और किशोरों को ही नहीं, बड़ों को भी पसंद आएगी और बाल साहित्य जगत में अपना विशिष्ट मुकाम बनाएगी।

 


समीक्षक


डॉ. प्रदीप कुमार शर्मा

विद्योचित ग्रंथालयाध्यक्ष

छत्तीसगढ़ पाठ्यपुस्तक निगम

पेंशनबाड़ा, रायपुर (छ.ग) 492001

मोबाइल नंबर 9827914888, 910913120

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