वातायन


वातायन 

जो विराजमान थे

सबसे ऊपर

अपनी गर्वीली नजरों से

देखा करते सदा  

राजा की तरह

वो वातायन 

जिनने भोगे

सभी सुखद पल

महल के 

उसकी चहल-पहल के... 

      .........

 


लोग 

देखा करते 

इस लालसा में

उनकी की ओर 

दुब-छुपकर

कुछ पल ही सही 

पर्दों की कैद से 

छुटकारा पाकर

यदा कदा 

प्रगट होंगे 

महल के   

'सूरज-चाँद' 

रात दिन के

मायनों में   

जो पा लेते दर्शन 

वो कृतार्थ हो जाते

उस वातायन के

जिंदगी भर के लिए... 

        .........

 

पर समय बदला 

रजवाड़ों संग

वातायन  

उजड़ कर

भग्नावशेष हो गये

दुनियां की नजरों में 

अवशेष हो गये

देखकर भी

ना देखते लोग

अब उनकी तरफ

सूनापन ही सिर्फ

अहसास कराता उन्हें  

अपनी मौजूदगी का  

यूँ तो ये वातायन 

हवा के घर होते हैं 

पर अब वो ठहरती नहीं

अपना घर समझ कर 

बल्कि डरा कर 

निकल जाती इनको 

पहले ये हवा हवा थे

अब तो जैसे 

हवा निकल गई इनकी

 

*व्यग्र पाण्डे, कर्मचारी कालोनी, गंगापुर सिटी,स.माधोपुर (राज.)322201,मोबा : 9549165579