अंशु का सपना  (बाल कहानी) 






*मीरा सिंह*
एक दिन पढ़ते पढ़ते मेरी आंख लग गई और मैं सपना देखने लगा। सपने में, मैं एक टूटी फूटी झोपड़ी के अंदर खड़ा था। वहां मिट्टी के कई बर्तन थे।सभी  बर्तन फटे पुराने कपड़े पहने इधर-उधर चहलकदमी कर रहे थे। शायद कहीं जाने की तैयारी में थे। मैं आश्चर्य भरी आंखों से उन्हें निहारते हुए बोला ,"अरे वाह, मिट्टी के बर्तन भी चलते हैं? मैं पहले कभी आप सबों को चलते नहीं देखा था ।आप सब कितने प्यारे लग रहे हैं।" इस पर नन्हें-नन्हें मिट्टी के दिए आपस में कुछ खुसुर फुसुर   करने लगे।देखकर  लगा ,उन्हें मेरी बात अच्छी नहीं लगी। मैं उनसे पूछ बैठा "अरे, आप सब तो आपस में कानाफूसी करने लगे। मैं कुछ गलत कह गया क्या ?वो सब कुछ नहीं बोले ।पर उनकी घूरती हुई आंखें बहुत कुछ बोल रही थी । बात बदलते हुए मैं पुनः बोल पड़ा "लग रहा है कि आप लोग कहीं घूमने की तैयारी में लगे हैं ?पर फटे पुराने कपड़े क्यों पहने हैं ?कुछ नया क्यों नहीं पहनते? पता है, हम लोग जब कहीं बाहर घूमने जाते हैं ना तो खूब सज संवर कर जाते हैं ।"इस पर एक मटकी मटकते हुए मेरे सामने आकर आंखें मटकाती  हुई बोली" हम इंसानों के जैसे नहीं हैं। वैसे भी यह जो घर देख रहे हो ना ?मेरे मालिक का है ।टूटा फुटा खंडहर जैसा  है। इसमें जब उसी को पहनने  के लिए कपड़े नहीं है,  खाने के लिए अन्न  नहीं है, सिर छिपाने के लिए छत नहीं है,तो वह हमारे लिए नए कपड़े कहां से लाएगा और हमें कैसे सजाएं गा? बोलो?वैसे भी हम इतने  नासमझ नहीं हैं कि किसी की माली हालत  समझे बगैर उससे कुछ फरमाइश करने लगे तुम इंसानों जैसे।" व्यंग भरी बातों से मेरा हृदय दुखी हो गया ।मै खुद को संभालने का प्रयास करते हुए  बोला "हां भाई, आप सब तो बहुत समझदार है। पर इतना घमंड भी ठीक नहीं है। इंसानों के साथ रहकर कुछ बुरी इंसानी आदतें आप लोगों में भी आ गई है ।है कि नहीं ?खुद को श्रेष्ठ समझने व सिद्ध करने की कोशिश को  आप क्या कहेंगे?  इतना सुनते हैं मिट्टी के सभी बर्तन एक दूसरे को यूं देखने लगे मानो आपस में कुछ  इशारा कर रहे हो। फिर एक साथ मेरी ओर बढ़ने लगे ।इंसानों के प्रति उनका गुस्सा और तेवर देख मैं मन ही मन भय से कांप उठा। वहां से जल्दी भागना चाहा पर  मेरे पैर कमबख्त टस से मस नहीं हुए।ऐसा महसूस हो रहा था कि वो जमीन से ही  चिपक गए हैं ।धीरे-धीरे मिट्टी के घड़े कलसा और सभी बर्तन एक दूसरे का हाथ पकड़े मेरी ओर बढ़ने लगे। मेरे मन में बुरे- बुरे  ख्याल उभरने लगे ।कहीं ये सब  अपने मालिक की दुर्दशा का जिम्मेदार समझ मुझसे बदला  लेने के लिए तो नहीं सोच रहे?मन में यह ख्याल आते ही मेरे दिमाग की बत्ती गुल हो गई ।और आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा। मैं समझ चुका था कि अब इनके जाल  में फंस गया हूं ।आज मॉब लिंचिंग से मुझे कोई नहीं बचा सकता। मेरी घिग्घी  बंध गई।सारे बर्तन कदमताल करते मेरे पास आ गए इतना पास कि मेरी गर्दन आसानी से पकड़ सके। मैं लगभग  बेहोश होने वाला था कि तभी एक बड़ा मटका मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए प्रेम पूर्वक मुझे देखा। उसके चेहरे पर उदासी भरी मुस्कान थी। कहने लगा" डरो मत   भाई ।हम इंसान थोड़े ही है, जो किसी बेकसूर के साथ  मॉब लिंचिंग करेंगे ।हम निरिह  क्या किसी को नुकसान पहुंचाएंगे? सृष्टि के प्रारंभ से ही हमारे पुरखे इंसान की सेवा करते आ रहे हैं । हमारे अंदर भी सेवा भाव है । पर देखो तुम लोगों ने क्या किया  ?चुकभुकिया के प्रेमजाल में फंसकर हमें कितना उपेक्षित किए?  हमारा अस्तित्व ही मिटाने पर तुले हो। इसलिए हम तुम्हारी दुनिया से कोसों दूर जा रहे हैं। हमेशा हमेशा के लिए ।अब हम तुम्हारे सपनो में या किस्से कहानियों  में नजर आएंगे । कहते हुए उसकी आंखों से आंसू गिरने लगे ।"अरे ,रुकिए तो। एक  मिनट रुकिए न ।" कहते हुए मैं उनके पीछे चल पड़ा। तभी किसी ने मुझे झकझोरा। मैं हड़बड़ा कर उठ बैठा। सामने मेरी मां मुस्कुरा रही थी ।पूछ बैठी" अंशु,फिर  कोई सपना देख रहा था क्या?  मैं सपने के बारे में सोचते हुए बोला "नहीं, बस यूं ही ।"और  वहां से उठकर चल पड़ा।  मन ही मन सोच रहा था "काश कोई मिट्टी के बर्तनों को विलुप्त होने से बचा पाता ।

*मीरा सिंह , डुमराँव ,जिला -बक्सर, बिहार