जाबांज सिपाही


*उमा पाटनी 'अवनि'*


मामूली मिट्टी से थोड़े ही बने होते हैं ये जाबांज सिपाही


 धूप में तपकर ठंड में डटकर तैयार करते हैं 

 अपने फौलादी जिश्म को

यूँ ही नहीं बनती एक शक्तिशाली  सबसे अनूठी तस्वीर

जाने कितने कष्टों को सहकर जिगर को 

सामान्य इन्सान से कई गुना बड़ा कर लेते हैं ये 

देशभक्ति के जुनून में पूरी तरह से सराबोर

सरहद पर झंडा लहराने की इनकी जिद

हमारी सुरक्षा को ले बैचैन ये सिरफिरे फौजी

वतनपरस्ती के आगे किसी की कहाँ सुनते हैं

छुट्टी के लिए ये तीन महीने पहले से

अर्जी लगाते हैं और छुट्टी न मिलने पर 

 घरवालों को मनाते हुए

भिन्न-भिन्न जगहों से आये लोगों संग 

त्यौहार मना हमें एकता का

पाठ भी तो पढ़ाते हैं

घर से दूर जंगल के किसी के कोने में

पर्स में लगी तस्वीर संग खूब बतियाते हैं

और पूछने पर आंसुओं को दिल के कोने में दबा

 झूठा-मूठा मुस्कुराते है ं

हमले की बात सुन जहाँ  आप और मेरे जैसों की

 रूह कांप उठती है वहीं कन्धे से कन्धे मिला ये

बहादुरी के गीत गाते है ं

और अदम्य साहस का परिचय देते हुए

इनके परिवार वाले इन रणबांकुरों को सलामी दे 

अपने जज्बातों को काबू में रख

 इनके माथे पर विजयतिलक लगा जय हिन्द की 

 गूंज का नारा लगाते हैं

धन्य है ये भारतभूमि जहाँ ऐसे वीर जन्म लेते हैं

ये अवनि नतमस्तक हो इन 

शूरवीरों व इनके परिवारजन के समक्ष  अपना ये शीश झुकाती है

 

*उमा पाटनी 'अवनि' पिथौरागढ़