ये जो अपनी इज्जत है


*डॉ हरीशकुमार सिंह*


ये जो ये जो आदमी की इज्जत है न, आदमी बताता तो ऐसे है जैसे कि वह इज्जत की बहुत चिंता करता है और यदि आदमी की इज्जत मतलब मान, मर्यादा, प्रतिष्ठा पर आंच आई तो वह इज्जत की खातिर मरने मारने को भी उतारू हो जाता है मगर हकीकत में इज्जत की कतई इज्जत शायद ही कोई करता होकुछ इज्जत और दौलत में से इज्जत को बढ़ाना चाहते हैं। लेकिन अगर आदमी सरकारी नौकरी में है तो इज्जत और दौलत दोनों को साध के चलता है कि दोनों बनी रहें। लेकिन कुछ होते हैं जो इज्जत को दरकिनार कर दुनिया के सारे झूठे, सच्चे काम बेख़ौफ़ होकर करते हैं और अपनी तिजोरी भरने के लिए लूट, डकैती, बेईमानी माफ कीजिये प्रचलित शब्द रिश्वत लेने से बाज नहीं आते और इज्जत को हमेशा खतरे में रखते हैं। यह भी सही है कि किसी सरकारी महकमे में एक आध ही भ्रष्टाचारी होता है तो किसी महकमे में एक आध ही ईमानदार भी होता है। यह सकून वाली बात है कि कोई भी सरकारी महकमा पूरा सौ प्रतिशत बेईमान नहीं मिलेगा। फिर भी किसी की इज्जत कभी कभी अकेले लुट जाती है जब रिश्वत लेते पकड़े जाते हैं। फिर भी दिखावे के लिए इज्जत भले ही दो इंच आगे बढ़े न बढ़े पर बरकरार ही रहे इसी की चिंता में सब लगे रहते हैंऔर अगर ऐसे में किसी ने किसी की अपनी इज्जत इज्जत सार्वजनिक रूप से खराब कर दी कि इस महकमे के सभी जनसेवक रिश्वतखोर हैं तो मामला संगीन भी हो सकता हैबात यह थी कि एक राजनेता ने भरी सभा में मंच से कह दिया कि इस महकमे के सौ प्रतिशत अधिकारी, कर्मचारी रिश्वत लेते हैं। राजनेता ने कहा इसलिए उस महकमे को बुरा लग गया कि एक राजनेता हमें रिश्वतखोर कह रहा है। जिनसे कभी जाने अनजाने ली होगी वो तो सब चुप बैठे हैं और 'चलनी कहे सुई से तेरे पेट में छेद।' हालांकि बुरा तो उस महकमे के ईमानदार को लगना चाहिए मगर इज्जत तो सबकी खराब हुई है ना और अपने अलावा कोई दूसरा अपनी इज्जत खराब कैसे कर सकता है। कोई कहे कि यह सौ प्रतिशत घूसखोरी वाला महकमा है तो सारे मिलजुलकर आईना दिखाने वाले का ही मुंह काला करने पर उतारू हो जातें हैं। सारे नंगे माने जाने वाले इकट्ठे होकर इज्जत के नाम पर अपनी इज्जत पुनः पाने के लिए, नंगा बताने वाले को ही नंगा कर उसकी भी इज्जत की ऐसी तैसी करने और उससे मांफी की मांग पर आमादा हो जाते हैं। अगर आप वाकई जनसेवक हैं, पैदाईशी ईमानदार के बाप हैं तो आपको कोई बेईमान कैसे कह सकता है। जिन लोगों के घरों के नक्शे आपने बिना कुछ लिए दिए पास किये, जिनकी तारीख लगाने के लिए आपने फाइल पर कुछ इज्जत है नहीं रखवाया, रपट लिखवाने वाले को आपने भगाया नहीं, बिना कमीशन के बिल पारित किए, जिनके नामांतरण, नपती मुफ्त में किये, फसल बीमा के लिए खराब फसलों का वाजिब मूल्यांकन आपने त्वरित रूप से कर अपने कार्य कौशल का परिचय दिया है तो पूरे शहर के लोग और सूबे के अन्नदाता आकर बोलें कि ये सब इस दुनिया के नहीं होकर साक्षात देवता हैं तथा हमारे सरकारी काम देखते ही बिना किसी लेन देन के, कर देते हैं और इन सबका सार्वजनिक नागरिक अभिनंदन होना चाहिएऔर अभिनंदन भी वो राजनेता या अधिकारी करे जिसने अपने पूरे कार्यकाल में कभी भी रिश्वत न ली होफिर न अभिनंदन करने वाले मिलेंगे और न ही अभिनंदनीय। अपने यहाँ तो बच्चा सरकारी अस्पताल में पैदा होता है तो बख्शीश का चलन है तो कभी घटना दुर्घटना से मर गया तो पोस्टमार्टम वाले भी बिना बख्शीश के स्वर्ग नहीं जाने देते। ऐसे में जब इज्जत शुरू से ही भाड़ में चली जाती है तो कैसी किसकी और कायकी इज्जत। इज्जत कमाई जाती है भैया और कुछ के लिए इज्जत का ही दूसरा नाम रिश्वत होता है शायद। भरोसा नहीं हो तो अभिनेता मनोजकुमार भी कह चुके हैं दृ न इज्जत की चिंता, न फिकर कोई अपमान की, जय बोलो..।


*डॉ हरीशकुमार सिंह,उज्जैन