मेरी बात सुनो

*आशुतोष*

 

अनेकता में एकता का देश 

फिर कैसे  फैल रही द्वेष

हाथो मे डंडे चेहरे पर आक्रोश

दुहाई दे रहे संविधान की 

ध्ज्जियाँ उड़ाते कानून की।

 

तोड फोड आगजनी 

सरकारी संपत्ति का रखवाला कौन

जीतने की नुकसान हो

उसके दुगूने वसूलेगा कौन?

 

संज्ञान लेते कोर्ट अलग

जाति मजहब में विभक्त हैं

थोडे सख्त अगर हो जाए 

प्रदर्शन करना दुर्लभ हो।

 

अलग अलग राज्य की

अलग अलग समस्याएँ

फिर भी जकड़े हुए है

जाति मजहब में दिशाएँ।

 

चाहिए सभी को केन्द्र से

अपनी अपनी दुकान चलाने को

अपनी रोटी सब सेकते है

अपनी अपनी वोट बचाने को।

 

प्रदर्शनकारियों सुन लो मेरी बात

हाथ कुछ नही आने वाला

चाहे कितने भी नेताओ का दोगे साथ

मतलब निकलते ही झाडेंगे अपने हाथ।

 

*आशुतोष

पटना बिहार

 


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