रोमें रोलां की दृष्टि में महात्मा गांधी


*नवेन्दु उन्मेष
रोमें रोलां फेंच भाषा के मनीषी साहित्यकार थे। उनके हृदय में महात्मा गांधी के प्रति अनन्य श्रद्धा थी। श्री रोलां गांधी जी की आर्थिक नीति, ज्ञान और चिंतन से प्रभावित थे। उन्हें प्रतिदिन डायरी लिखने की आदत थी जो कि फेंच में ’इंड’ नाम से प्रकाशित हुई है। इसी इंड में रोमें रोलां ने समय-समय पर महात्मा गांधी के संबंध में अपने विचार व्यक्त किये हैं। इस संबंध में प्रसिद्ध कथाकार व चिंतक जैनेंद्र कुमार ने लिखा है कि गांधी उनकी श्रद्धा के अनन्य पात्र थे। पर मानो रोलां की समझ के भीतर से समां नहीं पाते थे। भारत के अनन्य पुरूषों के संबंध में उन्हें कठिनाई कोई कठिनाई नहीं हुई। पर गांधीजी की महत्ता और विराटता के भीतर उन्हें सदा एक विरोधाभास नजर आता रहा। शायद इस उपरी विरोध में एक सूत्रता खोज
पाना ही आज की चुनौती है।
अपनी डायरी में रोमें रोलां ने महात्मा गांधी के अतिरिक्त रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, श्री आरविंद और रवींद्रनाथ टैगोर के विषय मेें लिखा है। मैं यहां सिर्फ रोमें रोलां के उन्हीं विचारों को रखूंगा जिसे उन्होंने गांधीजी के विषय में लिपिब़द्ध किया है। उन्होंने अपनी डायरी में फरवरी 1929 को लिखा है ’यंग इंडिया’ में गांधीजी घोषणा करते हैं कि उनका भारत छोड़ने का इरादा इस साल नहीं है और यूरोप भ्रमण का विचार उन्होंने त्याग दिया है जैसा कि पहले ही तय हो चुका था। मैं इन कारणों को अच्छी तरह से जानता हॅूं। यह उपनिवेशवाद का संध्याकाल है। गांधी जी को कांग्रेस के माफत जानकारी मिली है कि भारत के लिए संविधान पर सहमति के लिए देरी ब्रिटेन में ही हुई है। यह अवधि 31 दिसंबर 1929 को समाप्त होने वाली है। गांधी ने अपनी जनता का साथ देने की प्रतिज्ञा की है जो पूरी स्वाधीनता की मांग करती है वह भी बिना शर्त के। इसलिए उन्होंने कहा कि वे अपनी भूमि को करने या मरने का ध्येय लेकर अब नहीं छोड़ेंगे।
अप्रैल 1930 को रोमें रोलां ने लिखा है, गांधीजी ने अपने अनुयायियों की एक इकाई बना डाली है जो एक से लेकर दूसरे तक हस्तांतरित होती रहेगी। यह भविष्य का द्वार है। किसी भी महापुरूष में ऐसी बात अत्यंत दुर्लभ है जहां पर अनुयायी विचारों में स्वतंत्र हों। अपनी डायरी में जून 1930 को लिखा है। भारत के पक्ष में हस्तक्षेप करने के लिए मुझे ढेरा पत्र मिले हैं। उनमें से एक पत्र ला मौंद ने भेजा है। मैं 3 जून को इसका उत्तर देता हॅूं। मुझे यूरोप से ढेरो ऐसे पत्र मिले हैं जिनमें आग्रह है कि गांधी की गिरफ्तारी के विरोध में एक आंदोलन की शुरुआत की जाये। मैं इन उत्तेजित भावनाओं को अच्छी तरह समझता हॅूं और मौंद को लिखता हॅूं कि भारत के प्रति वह हमारी संपूर्ण सहानुभूति को खुलकर प्रेषित करें, ऐसे भारत के प्रति जो आज अपनी स्वाधीनता की मांग करता रहा है। ऐसी मांगे करने का उसका हक भी है और इसके लिए उसके पास शक्ति भी है। लेकिन गांधी और उनके कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी का विरोध करना व्यर्थ ही होगा और वह गांधी की इच्छाओं के विरुद्ध भी होगा। गांधी ने कभी यह नहीं सोचा विचारा कि इतना शक्तिशाली आंदोलन छेड़ने के बाद वह और उनके अनुयायी बिल्कुल सुरक्षित रह पायेंगे। वह जानबूझकर कैदखानों और मौत के सामने निहत्थे चले।
27 फरवरी को गांधी ने लिखा है कि अंत में इस पूरे जत्थे में, इन आंदोलनकारियों में एक भी नागरिक जिंदा या आजाद नहीं बचेगा। यह शब्द उन लोगों का नहीं है जिनके पास कोई गहरा विश्वास नहीं है जो यह अच्छी तरह से समझता है कि कोई भी महान लक्ष्य किसी मामूली कीमत के द्वारा नहीं हासिल किया जा सकता। भारत इतना जागृत हो चुका है कि इस वक्त उसके पक्ष में, गांधी की गिरफ्तारी के लिए किसी विरोध प्रदर्शन की नहीं बल्कि उसे बधाइयां देने की जरूरत है। ब्रिटिश साम्राज्य चाहे जो भी हथियार इस्तेमाल कर ले, अंतिम विजय भारत की होगी क्योंकि उसके पास गांधी जैसा अस्त्र है। रामकृष्ण मिशन पर गांधी के विचारों के प्रभाव के संबंध में रोमें रोलां ने जून 1930 को लिखा है। महात्मा गांधी से संपूर्ण भारत इस समय प्रभावित है। यही बातें रामकृष्ण मिशन पर भी लागू होती है जो राजनीति से परे रहने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन वहां के पुजारियों और महंतों पर भी गांधी का प्रभाव देखा जा सकता है। श्री रोलां ने गांधी जी के जन्म दिवस के अवसर पर अक्टूबर 1930 को रेजीनाल्ड रेनाल्ड नामक एक पत्रकार को पत्र लिखा था। जिसमें उन्होंने कहा था कि गांधी भारत के युगद्रष्टा हैं। उनके नेतृत्व में भारत आजाद होकर अवश्य रहेगा। यहां तक कि वे हमारे युग के अंधकारमय आकाश में चमकरने वाले दृढ़ प्रकाश भी हैं। वह भी ऐसे समय में जबकि हमारी सभ्यता की नाव धन-जन को डूबो देने के खतरे के साथ तूफानों के बीच डगमगा रही है। मई 1931 को रोलां ने एडमंड प्रिया के साथ गांधी, लेनिन और क्रांति जैसे विविध प्रश्नों पर विचार व्यक्त करते हुए कहा है। आप जानते हैं कि कुछ वर्ष पूर्व गांधी स्वीटजरलैंड आने वाले है क्यों कि वे मुझसे मिलना चाहते थे। और आप अच्छी तरह जानते हैं कि मैं भी यह चाहता था। बावजूद इसके मैंने उन्हें मना कर दिया। मैं चाहता था कि गांधी यूरोप के
नौ-रेजिस्तां युवकों के साथ संपर्क स्थापित करने, उनकी बातें सुनने तथा उनका पथ-निदेशन करने के उद्देश्य से आयें, सिर्फ मुझसे मिलने के लिए नहीं, क्यों कि मैं अपने को उनके योग्य नहीं पाता। मैं जानता था कि उन्हें मेरे बारे में भ्रम है जिसका कारण निःसंदेह हमदोनों की मित्र ’मीरा बैन’ है। मैं अपने को इस योग्य भी नहीं समझता कि उनके बहुमूल्य जीवन के कुछ दिन नष्ट करूं, जिस पर उनकी जनता और मानवता का अधिकारी है। साथ ही गांधी यूरोप के विचारों से अपने विचारों की मुठभेड़ देखने के बिल्कुल इच्छुक नहीं हैं।
सितंबर 1931, गांधी ने मुझे अपने जहाज ’राजपुताना’ से तार भेजा है। वह 29 अगस्त को बंबई से रवाना हो चुके हैं। 11 सितंबर को मार्सेल्स पहुंच रहे हैं। वह चाहते हैं कि हम मासेंल्स में कैले के साथ उनसे मिलें। लेकिन रोमें रोलां कि तबीयत अचानक खराब हो जाने की वजह से गांधी जी से मिलने की योजना उन्हें रद्द कर देनी पड़ी। रोमें रोलां ने 10 सितंबर 1931 को गांधी जी को पत्र लिखा ’प्रिय मित्र, यह मेरे लिए पीड़ा की बात है कि यूरोप की भूमि पर आने पर में आपके अभिवादन हेतु अपनी बहन के साथ न आ सकूंगा। मेरे स्वास्थ्य ने आपसे मिलने की अनुमति नहीं दी। मैं लुगानों से, मार्सोल्स पहुंचने के लिए विलन्यम गया लेकिन बारिश के देशों से अचानक गर्मी के देशों में गुजरने के कारण मुझे सर्दी लग गयी है। अतः मुझे इन दिनों बिला ओल्गा में बंद रहना पड़ेगा। मैं चाहता हॅूं कि बाद में भारत लौटते समय आपके लिए यहां आना संभव हो सके ताकि हम जीवन में एक-दूसरे को देख सकें।रोमें रोलां ने अपनी डायरी के पृष्ठों में लिखा है, दिसंबर 1931, इतने कि दिनों गुमनाम गांधी का आगमन अब होने वाला है। गोलमेज कांफेंस की धीमी प्रगति के कारण इसमें एक या दो महीने की देर हो गयी है। गांधी के आगमन की जानकारी के कारण, अचानक षुरु हो गयी है पत्रों, टेलीफोनों और तरह-तरह के अनुरोधों की बौछार और आवश्यक हो गया है अपने को बचाना। इनमें से कुछ विचित्रता भरे पत्र हैं तो कुछ पागलपन की हद तक पहुंच गये हैं। जर्मन व स्वीट्जरलैंड के नग्नतावादी गांधी को पकड़ना चाहते हैं, और उन्हें उनसे बचाना है। कुछ नौजवान तो महात्मा गांधी की खिड़की के नीचे वायलिन व बांसुरी बजाना चाहते हैं। ताकाता नामक युवा जापानी शिल्पी के पेरिस आने का इंतजाम कर देता हॅूं ताकि वह गांधी को देखकर उनकी मूर्ति बना सके।
गांधीजी की पहली मुलाकात रोमें रोलां से 5 दिसंबर 1931 को पेरिस में हुई थी। रोमें रोलां ने लिखा है ’सोमवार को गांधी का मौनव्रत है, वह बोलते नहीं, लेकिन सुनते हैं।’ उन्होंने हंसते हुए बताया कि औरों के लिए यह सबसे अच्छा दिन है, क्योंकि वे जो कुछ सुनाना चाहते हैं, मुझे सुना सकते हैं। मौन के दिन बिना उत्तर दिये गांधी को सब कुछ सुनना पड़ता है। 9
दिसंबर को अपराह्न में गांधीजी मीरा के साथ एक बूढ़ी ग्रामीण स्त्री  से मिलने सेपे जाना चाहते थे, जिससे मीरा का बहुत पहले परिचय हुआ था। यह महिला भारत की देहाती महिलाओं की तरह सूत काटती थी। दोनों ने गांधी के बारे में एक साथ चर्चाएं की थी कार से गांधी के जाने की व्यवस्था की गयी। वह उस ग्रामीण औरत से हुई मुलाकात पर मुग्ध हैं। औरत को सूत काटने में उलझा हुआ पाते हैं, और उसके सामने गप्प-गप्प के लिए बैठ जाते हैं। उन्हें लगता है कि, वह भारत में हैं और उनका कहना है कि यह जगह भारत की तरह है। वह बूढ़ी महिला जिसे गांधी के आगमन का कोई आभास न था, उनसे मिलकर मुग्ध तो हो गयी, पर आश्चर्ययकित बिल्कुल नही। रोमें रोला ने लिखा है कि 11 दिसंबर 1931 को विदा होने के लिए गांधी जी मेरे घर पर सुबह नौ बजे के बाद आते हैं और हमारे बीच अंतिम बातचीत होती है।


*नवेन्दु उन्मेष
रांची, झारखंड