एक मात्र दिवस


*कोमल वाधवानी 'प्रेरणा '


" बधाई !" एक परिचित साहित्यकार का जोशभरा स्वर सुनाई दिया।
" बधाई  ? किस बात की बधाई ? " मैंने अनजान बनते पूछा ।
" अरे ! आज तो आपका महिला दिवस   है। " मेरी ओर से औपचारिक या अनौपचारिक उत्तर न पाकर कुछ पल सन्नाटा रहा । " मैडम , हमने सोचा था आज के दिन आप बहुत ख़ुश होंगी ,पर आप तो बात करने के मूड में ही नहीं लग रहीं ।" 
" तीन सौ चौसठ दिन आप पुरुषों के ...सिर्फ़ एक दिन बधाई देकर किसे ख़ुश करना चाहते हैं?"    कहते - कहते मैंने फ़ोन रख दिया । 
आज का दिन ज़रूरत से ज़्यादा ही बोझिल हो गया । दूसरे के होंठों पर आई हँसी भी मानो मेरा मजाक उड़ा रही थी ।
एक बार ख्याल आया फिर किसी ने फ़ोन किया तो...........? क्यों न रिसीवर उतार कर ही रख दिया जाए  ? फिर सोचा , क्यों न अपनी दीदी से बात कर लूँ ! 
"दीदी ,आप इतनी बड़ी डॉक्टर हैं..... सबकी संगिनी के नाम से मशहूर हैं....आज तो आपके पास बधाई   देने के लिए बहुत सारे फ़ोन आए होंगे ? "  
"  हाँ । " 
" पर मैंने आपको बधाई देने के लिए नहीं एक प्रश्न पूछने के लिए फ़ोन किया । आज एक दिन कोई पुरुष यह विश्वास दिला सकता कि सिर्फ़ आज..... सिर्फ़ एक दिन कहीं कोई दुष्कर्म नहीं होगा ? "
"कोमल , तुम यह संवेदनशील प्रश्न अपनी डायरी में नोट कर लो ।" डॉक्टर दीदी के जवाब में ठंडापन था।
इधर हमारी बातचीत चल रही थी और उधर सिर्फ़ साठ किलोमीटर दूर दुष्कर्म की घटना घट रही थी । 
अगले दिन समाचार पत्रों की सुर्खियों में पहले पन्ने पर ख़बर थी , " महिला दिवस पर इंदौर के मॉल में नौ साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म ।" 
महिला दिवस पर इस ख़बर को क्या समझा जाए ....बधाई या महिला दिवस का तोहफा ? 


*कोमल वाधवानी 'प्रेरणा ',उज्जैन(म.प्र.)