सोन पापड़ी की अभिलाषा

*सौरभ जैन*

'भारत त्योहारों का देश है। राम जी के आने की खुशी में अयोध्यावासियों ने दिये जलाकर उत्सव मनाया था इसलिए हम इस दिन दिये जलाते है।' हम अपने स्कूल के दिनों में मेरा प्रिय त्यौहार विषय पर कुछ इस तरह से ही निबंध लिखा करते थे। क्या करें तब त्यौहारों की आलोचना का ट्रेंड भी नही हुआ करता था! आधुनिकता के नाम पर परंपरा की जग हंसाई भी नही होती थी। पर इस बार हमने दीवाली नही मनाई बल्कि बाजार ने हमसे दीवाली मनवाई है।साक्षरता अभियान का आलम यह था कि बाजार ने वस्तुओं तक को शिक्षित बना दिया। इंसान निरक्षर बन गया और उत्पाद शिक्षित हो गए। इस दीवाली पर उत्पाद खुद ही खुद को खरीदने की अपील इतनी मासूमियत से करते दिख रहे थे कि 'हम दिल दे चुके सनम तेरे हो गए है हम' हो गए। हम अब तक इसी भ्रम में है कि हमने दीवाली मना ली। जरा कोई 50 रुपये की वस्तुओं को दीवाली सेलिब्रेशन पैक के नाम पर 500 रुपये में बेच देने वाले कलाकार व्यापारियों से जाने असली दीवाली होती क्या है! जब परम्पराओं से पीछा छुड़ाया जाता है तब आधुनिकता बाजार के रूप में अतिक्रमण कर लेती है। फिर हमें मिट्टी के दियों के लिए कैम्पेन चलाने की जरूरत आन पड़ती है। 


इन दिनों तो सोन पापड़ी और सरकार दोनो में समानता देखी जा सकती थी, दोनो के पास ही समय नही था। आम आदमी अपने जीवन में काजू कतली सरीखी उम्मीदें तो पाल लेता है लेकिन अपेक्षाएं पूरी होते-होते परिणाम सोन पापड़ी के रूप में सामने आते है। जीवन का यथार्थ ही यही है। इतने दिनों की भागमभाग से थक हार कर सोन पापड़ी दीवाली के बाद रिलेक्स मोड़ में डायनिंग टेबल पर पैर पसारे रेस्ट कर रही थी। सोन पापड़ी को लगा जैसे कि यह उसका फाइनल डेस्टिनेशन है। इस घर में ही उसे मोक्ष की प्राप्ति होगी जिसके लिए वो हफ्ते भर से घर-घर में इसकी टोपी उसके सिर हुए जा रही थी। सोन पापड़ी इस बात से अंजान थी कि यह दौर दिलो में अंधेरा रख घरों को रोशन करने का चल रहा है। बेचारी, निर्जीव वस्तुएं सजीवों की तरह छल कपट से रहित होती है। सारा दिन लोग आ रहे थे, जा रहे थे लेकिन उसको कोई मुँह ही नही लगा रहा था। रात आते टेबल पर पड़ी-पड़ी वो फ्रस्टेड हो गई। गुस्सा तब सातवें आसमान पर पहुँचा जब एक सज्जन आये और उन्होंने उसे देख भद्दा सा जोक सुन दिया जिसे सुन वहां उपस्थित सभी जन अपनी निरक्षरता का प्रमाण दे रहे थे। सोन पापड़ी खुद से बोल उठी, 'चाह नही इन अमीर घरों के टेबल पर पाई जाऊं, चाह नही रईसों के घरों में आदान-प्रदान को जाऊं, मुझे चुरा लेना ए लोगों और देना उन भूखे पेटों को भेंट, हंगर इंडेक्स में जिनके आंकड़े है अनेक।'

 

*सौरभ जैन इंदौर,मोबा. 8982828283