परवरिश  किशोरों की


*नीरज मिश्रा


आज की इस भागदौड़ भरी जिन्दगी में किशोर बच्चों कीपरवरिश करना बेहद मुश्किल होता जा रहा है। पहले के समय और आज के समय में ज़मीन आसमान का अन्तरसामने आ रहा है इस उम्र में बच्चों के व्यवहार में बेहदआश्चर्यजनक बदलाव आ रहे हैं। यह परिवर्तन बेहद शापितहो सकते हैं। माता-पिता और बच्चों में टकराव की स्थितिउत्पन्न होती है/ होती जा जा रही है। कभी-कभी तो यहस्थिति बडे़-बड़े हादसों को जन्म दे देती है। जब तक माता-पिता सचेत हो पाते तब तक बहुत देर हो चुकी होती है औरस्थिति विष्फोटक हो जाती है, उनके पास पश्चाताप केअलावा कुछ नहीं रहता।


पहले संयुक्त परिवार होते थे, परिवार में किशोर बच्चों केदोस्त के रुप में कोई न कोई घर पर मौजूद होेते थे। जैसे कोईचाचा, बुआ, मामा, मौसी जिनसे किशोरों की भावनाएँ छिपीनहीं रहती थी और आपसी तालमेल से अनहोनी की आशंकाकम ही हुआ करती थी। पर आज एकल परिवार में थितिबहुत ही खराब हो गयी है। माता-पिता किशोरों को शत्रुसमान होते ही और उन्हें समझाने वाला कोई नहीं होता हैतथा रोज नित नये हादसों की ख़बरें अखबारों में पढ़ने कोमिल रही हैं, कुछ खबरें ऐसी हैं जो छपने के काबिल नहींहोती वे छप भी नहीं पाती हैं। इसका कारण है अशिक्षा, बुरीसंगती बच्चों के मनोबल को खराब करती है। कहा जाता हैजैसा देखते हैं, सीखते वही, वैसे बन जाते हैं।


इस लेख के माध्यम से कुछ सुझाव आपके सामने हैं। मैं तोनहीं कह सकती कि ये शत-प्रतिशत कारगर होंगे लेकिनअपेक्षा रखती हूं स्थितियाँ काफी हद तक आपके पक्ष में हों।


1. किशोर 10-17 की आयु में शारीरिक एवं मानिसकपरिवर्तन होते हैं। इसके बारे में बच्चों को कुछ समय पहले हीबताएं क्योंकि ज्यादा पहले बताने से बच्चे बातों कोनज़रांदाज कर देते हैं। जब बच्चे क्रोध करें तो उन पर नाराजहोकर अपना गुस्सा निकाला आग मंे घी डालने के समानहोता है और माता-पिता व बच्चों के बीच गहरी खाई बनजाती है/ बनती चली जाती है।


2. अपने आप को बच्चों की जगह रखकर देखो कभी आपभी उनकी उम्र के थे तब आपको कैसा लगता था कि किसीभी बात को समझाने के लिए कहानी (जो जीवंत हो) कासहारा लेना चाहिए? कहानियों के माध्यम से बच्चे बहुत कुछसीखते हैं। उदाहरण के लिए एक किशोरी को लड़के सेसतर्कता के बारे में समझाने के लिए उसे आप अपने स्कूल/काॅलेज की कोई ऐसी कहानी /घटना सुनाएं जिससे लड़कीद्वारा समझदारी दिखाई गयी हो, चाहे वो घटना काल्पनिक हीक्यों ना हो, किशोरावस्था कल्पनाओं में विचरण/ विश्वासकरती है


3. बच्चों से हमेशा प्रेम से बात करें ज्यादा से ज्यादा समयउनके साथ बिताएं जिससे उनके मन में उठने वाली तरंगों कोआप पढ सकें। एक समझदार माँ-बाप ही अपने बच्चों कोअच्छी तरह समझ सकते है। ऐसे माता-पिता बनना सभी काफर्ज़ है, और बनो भी। आज मैं भी एक माँ हूं, एक माँ काकत्र्तव्य क्या हैं? जो समय हमारा था आज वो नहीं है। ना येसाधन थे, ना ये देखने को मिलता था जो वर्तमान में देख रहेहैं, सुन रहे हैं, पढ़ रहे हैं।


5. बच्चों को आशावादी अहिंसावादी बनाएं पर अतिआशावादी से हमेशा बचाने की कोशिश करें। दूसरों परविश्वास करना ज़रुरी है पर अंध-विश्वास अनहोनी को दावतभी देता है, जिससे हमेशा सावधान रहना सभी का कत्र्तव्यबनता है। कोई बाहरी आपके बच्चों को गलत रास्ते पर लेजाए उससे पहले आप उसके सच्चे मित्र बनो।


6. किशोरावस्था में स्कूली पढ़ाई के साथ हल्की-फुल्कीसाइड कोर्स भी कराना चाहिए जिससे पढ़ाई के बाद का बचासमय उन बच्चों के लिये उपयोग मे लाया जा सके और बच्चेभटकाव से बचे रहें। बच्चे सदैव अपने बड़ों से ही सीखते हैंजिस तरह की दिनचचर्या को वे देखते हैं। उसी का अनुकरणवे स्वय करते हैं। आप स्वयं भी टी.वी., मोबाईल का उपयोगउतना ही करें जितना जरूरी है और बच्चों को भी इन सबसेदूर ही रखें। आज टी.वी चैनलों पर फूहडता ज्यादा परोसीजा रही है। इसलिए इस बात का विशेष ध्यान रखें की आपकेबच्चे आपकी अनुपस्थिति में क्या सीख रहे हें, डनहें अच्छेकार्यक्रम देखने के लिए प्रेरित करें व उसका अनुकरण स्वयंभी करना जरूरी हैं।


अब बच्चों की परीक्षा चल रही है, जितना समय आप अपनेबच्चों को दे सकें दें, ये आपका कीमती समय बच्चों के लियेबहुत जरूरी है। बच्चे परीक्षा के दिनों में दबाव में आ जातेहैं। जो वे पढ़ते हैं उसे भी भूल जाते हैं।


*नीरज मिश्रा, उरई-जालौन, उ.प्र.